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०२ ऑक्टोबर २०२२

गांधी...

किसीने गाली दि
किसीने ने गोली दि
फिर भी वो मरा नहीं
क्योनी वो सिर्फ गांधी नही
सत्य, अहिंसा जैसे विचारो का वो आंधी है...

हमने देखा वो पतला था
हमने देखा वो टकला था
एक धोती और लाठी जैसे भी हो
आझादी के लिए लडने वाला
आखरी बुंद का वो कतरा था...

वो ना कभी नेता था
जाती-पाती ना करता था
वो तो राष्ट्रपिता था (है)
हिंसा वो न करता था,  सत्य सिर्फ कहता था
इसलीए तो सबका वो चहीता था
उसका मतलब सिर्फ सत्य और अहिंसा था...

था! की बात छोडो
वो आज भी सत्य और अहिंसा है,
भारत का राष्ट्रपिता है
दुनिया का वो नेता है
आज भी वो गांधी मतलब
सिर्फ महात्मा गांधी है...

१५ सप्टेंबर २०२२

इंजिनिअर बना दिया...

हर वक्त अपना किरदार बदलकर कर निभाना हि
जिंदगी का law of conservation था… 
मत जाओ उधर (Engineering  कि तरफ) फिर भी आग से खेलने का जो शौक था
और क्या चार साल और चालीस किताबो ने मुझे  कागजो पे इंजिनिअर बनाया था…

कुछ लोगो का Fb-Insta अकाउंट क्या बनाया
उन्होने तो मुझे IT इंजिनिअर बना दिया…
गाडी का स्पार्कप्लग ठीक-ठाक करके गाडी को क्या चालू किया
उन्होने तो मुझे मेकॅनिकल इंजिनिअर बना दिया…
सही सिमेंट-रेत का फॉर्मुला क्या बताया
उन्होने तो मुझे सिविल इंजिनिअर बना दिया…
ऐसे हि लोग बनाते गये और मैं बनता गया

जॉब नहि मिल तो वो कहते गये
हम सहते रहे
फिर हम भी निकले घर से
कह गये, हम भी लौटेंगे कहि और से बहुत दूर से…
आये फिर लाखो का पॅकेज लेकर
क्योकी, हर कर्म का फल हो ना हो 
लेकिन हर Action का Reaction जरूर होता है
जवाब देना हर एक को आता 
पर इंजिनिअर हू बातो से ज्यादा पॅकेज से जवाब देने का मजा बहुत आता है…    

हर वक्त कुछ भी हो
जो कभी हारा नही 
डरकर जो कभी गिरा नही
हर समस्या का जिसने जुगाड बनाया
उसको कि तो आखिर जिंदगी ने इंजिनिअर बनाया…

३१ ऑक्टोबर २०२१

ट्रेनिंग के वो दिन...

कही पंछि को पिंजरे से प्यार ना हो जाए
और वो पिंजरे में ही ना रह जाए;
उसे उडना ही उचे आसमान मे था
इसलीय ही शायद ये समय एक ही साल का था।

यहा हर जगह 
ऊस कँटीन के पास
वहा गेट से थोडा दूर
ऊस छत्री के नीचे
या कहो तो उस इंजिन के उप्पर
तेरे और मेरे कही किस्से है
कुछ तेरे तो कुछ मेरे हिस्से है।

०१ ऑगस्ट २०२१

दोस्त या दोस्ती

कभी हसाता हू
तो कभी रुलाता हू
मैं ही गिराता हू
और मैं ही संभालता हू

ना बुरा हू ना अच्छा हू मैं
मुझे समझलो तो हर वक्त सच्चा हू मैं

तू गलत हो अगर तो टोकता हू मैं
राह हो गलत तो रोकता हू मैं

बरसात मे गरम चाय का प्याला हू मैं
तेरे हर सीक्रेट का ताला हू मैं

तेरे दुख मे एक खंदा हू मैं
तेरा हर दुख समा दु वो बंदा हू मैं

दोस्त कहो
या दोस्ती हू मैं
तुझे हर बार
समझने वाली वो हस्ती हू मैं...

हर एक बात बता दो उसको
एक बार सिर्फ पता दो मुझको
हर एक को दोस्त ना देने की 
बोल भगवान क्या सजा दु तुझको...

१३ मार्च २०२१

खाकी

ये मैं हू...
या ये खाकी है 
अगर सिर्फ मैं होता..
तो मेरा बस एक नाम होता
ये खाकी है
इसलिए मेरी एक पहचान है..

मैं होता..
तो दुनिया रंग दिखाती
ये खाकी है
इसलिय दुनियाको रंग दिखाती है

मैं होता..
तो लोग हाथ छोडतें
ये खाकी है
इसलिय दूर का साथ जोडते है

ये मुझपर चढ़ी हुई खाकी है
या खाकी मे मिला हुआ मैं हू..
कुछ भी हो
अब तो खाकी हमारी यार है
प्यार है..
दो जिस्म एक जान है
यही अब हमारी शान है
सम्मान है...

आखीर...
ये मैं और मेरी खाकी है...
अब सिर्फ दो सीतारो की उम्मीद बाकी है।

०७ फेब्रुवारी २०२१

Valentine Week ( प्यार का सप्ताह)

Valentine Week

एक रोज दो उनको
     जो हर रोज जिते है आपके लिए*

प्रोपोस करो एक रात
   और बयान कर दो दिल की वो हर एक बात*

एक चॉकोलेट दो उनको
     जो दिल के साथ पेट से भी भुखे रहते है*

एक टेडी दो उनको
     जो खयालो में भी महसुस करना चाहते है आपको*

प्रॉमिस करो एक बात
     हर पल होंगे हम-तुम एक साथ*

एक किस दो उनको
     जो हर वक्त करते है मिस आपको*



एक हग दो उनको
     जो महसुस करते है अकेले अपने आपको*

व्हॅलेन्टाईन बनो उनके 
         जिनके प्यार हो सिर्फ आप
फिर वो चाहे हो गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड
           या चाहे हो दोस्त या हो माँ-बाप

०२ ऑक्टोबर २०२०

सुख और दुख

 


अब बाईक लेकर भी इतना खुश नही हू

जितना साईकल लेकर हुआ था।


अब हजार रुपये गुम होनेपर इतना दुखी नही हु

जितना पहले पाच रुपये गुम होकर हुआ था।


अब बीस हजार का मोबाईल लेकर भी इतना खुश नही हू

जितना एक हजार का नोकिया लेकर हुआ था।


अब दस साल हो गये घरसे जुदा होकर इतना दुखी नही हू 

जितना पहले एक दिन घर से जुदा होनेपर हुआ था।


अब पोस्ट ग्रॅज्युएट की डिग्री लेकर भी इतनी खुश नही हू

जितना दसवी मे सिर्फ पास होकर हुआ था।


ये सब सुख और दुख बदल गये

या वक्त के साथ हमे बदलने कि आदत हो गई है।

शायद बहुत कुछ बदल जाता है

बढती उम्र के साथ

पहले हम जिद्द किया करते थे

या अब हम समझोते किया करते है।

१० जून २०२०

डर लगता है...


शहर मे गया तो
गाव को तो ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

नये दोस्त मिलने से
पुराने दोस्तोको तो ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

अच्छे दिन आने से
बीते दिनो को तो ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

कुछ अच्छे की चाहत मे
बेहतरीन को तो ना गमा दु
इस बात से डर लगता है...

अच्छा चेहरा मिलने से
पहले प्यार को तो ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

कुछ रिश्तों को निभाते निभाते
कुछ अपनो को ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

कुछ अपनो को खुश रखने में
अपने सपनो को ना भुल जाऊ
इस बात डर लगता है...

कुछ नया सिखने के चक्कर मे
अपने संस्कार को तो ना भूल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

हक्क की मांग करते वक्त
अपने कर्तव्य को तो ना भुल जाऊ
इस बात से डर लगता है...

धर्म की बात करते समय
कही मैं भी इंसानियत को तो ना भुल जाऊ इस
बात से डर लगता है...

हा मैं डरता हू...
काश! दुनिया को समजने के उलझन मे
खुद को ही ना भूल जाऊ...
प्यार से भरी इस दुनिया मे
कही नफरतो का सागर (समुंदर) बन जाऊ...
खुद को संभालते संभालते
कही बिखरना तो ना भुल जाऊ..
और डरते डरते कही मै
लडना ही ना भुल जाऊ..

सुखी होण्याचं गुपित

          "द अल्केमिस्ट" या पुस्तकाबाबत स्पर्धा परीक्षेच्या एका डेमो लेक्चर मध्ये ऐकायला मिळाले. म्हटलं वाचूया हे पुस्तक पण आपल्या...